Saturday, 6 July 2013

आज भीग जाएँ भीतर से, गीले हो जायें



आओ प्यार करें 
तब तक 
जब तक है ज़िन्दा 
जिस्म का परिन्दा 

आज  भीग जाएँ भीतर से 
गीले हो जायें 

सिलसिला ऐसा चलाओ कि 

सीले हो जायें

डूब जाएँ 
ऐसे 
जैसे 
बुल्ला डूब जाता था अपने मुर्शद की याद में 
आह मिल जाए अपनी मीरा की फरियाद में

-रोज़ी 



5 comments:

  1. thanks ROZI ji to inspire me to write a song like this .have fun -
    http://vicharonkachabootra.blogspot.in/2013/07/blog-post_7.html

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  2. kya yahi kavita hai
    jise aap aadhyatmik kahti hain

    badi geeli kism ki aadhyatmikta hai ji..........

    prabhu aapko khoob geela rakhe........meri shubh kaamnaayen

    -albela khatri

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  3. आपके शब्द मेरे लिए आशीर्वाद की तरह है आदरणीय अलबेला जी ........
    आप जो भी कहेंगे, मुझे स्वीकर होगा, क्योंकि आप एक जन्मजात पुरूष हैं और पुरूष की बात का क्या बुरा मानना ,,,, बेचारे पहले ही घर के सताए हुए होते हैं ......यहाँ भी हम आपके कपड़े उतारेंगे तो आप लाज बचाने जाओगे कहाँ .........हा हा हा कैसी रही कविराज ....
    जो भी हो कल आपकी एक कविता मैंने फेसबुक पर पढ़ी थी प्रकृति वाली .........कसम से भीतर भीतर फूल खिल गया आनंद का .....मैं वो कविता अपने ब्लॉग पर लगाना चाहती हूँ ......क्या आप अनुमति देंगे

    -रोज़ी

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